Monday, April 22, 2013

lafz-e-samandar

तुम्हारी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदलते बदलते,
न तुम्हारे मन की हुई न अपनी सी रह गयी.

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मैं "आईना" हूँ मेरी अपनी जवाबदारी है ,
जिसे कबूल न हो वो सामने से हट जाए l

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पत्थर को पूजे तो पत्थर भगवान् हो जाये 

इन्शान को क्या करे की ओ एक अच्छे इन्शान हो जाएँ !!

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यूँ तो कहने को हम बड़े खुशमिजाज़ हैं लेकिन
रुला देती है ,,अपनों के प्यार की हसरत कभी कभी..

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सामने हैं जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा भी नहीं उसको खुदा कहते हैं.

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मेरी आवारग़ी पर कम से कम तू तो ना बोला कर !
तेरी यादों के कारण ही ये घर अच्छा नही लगता !!

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दिल के किस्से कहां नहीं होते
हां ये सबसे बयां नहीं होते.

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ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है
कितना झुककर किसे सलाम करो.

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